Tuesday, October 29, 2013

Innocent humour...simpler times !

Purane Gunah Naye Gunahgaar

A mini review and discussion on the presence of humour and understated satire in SMP's work -- in simpler times !


Purane Gunah Naye Gunahgaar by Surender Mohan Pathak
My rating: 4 of 5 stars

This mini-novel was written in 1963, yet doesn't feel much dated today. In fact it is quite a well paced whodunit-thriller interlaced with lovely humour that fits quite organically in the story. And the humour is not of the slapstick version, so common in whodunits, but has rather suave feel to it. The principal character, Sunil, is smart, vulnerable and a really charming character, who is always ready with a quip on his lips and a twinkle in his eyes. And although the murder actually happens well into the second half of the novel, you won't find a single uninteresting paragraph throughout primarily because the length of the novel itself is quite short and the pace is good.
But the real soul of the novel is the language that the characters speak : the classical Hindustani of 1960's era! What lovely words suffused with all the innocence and simplicity of a bygone era! You start suspecting that all the characters have just came back from a 'mushayra' or a 'kavi goshthi'. And add to that the innocence and charm of the 60's, which spills out of the demeanour of the characters here and engulfs you as well. How can you not fall in love with such people ?!

The only niggle that I had with the novel was that for such good buildup, the ending was a bit rushed and did not do justice. Also the speed at which some of the investigative actions were conducted in the novel ( especially for the 60's era ) require some suspension of disbelief. Apart from that a very enjoyable read, if not for anything else then at least for the nostalgia factor and as a remembrance for much simpler times!

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A mini discussion to follow-up :


विशेषकर जिस पक्ष ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी वो था नॉवेल का ह्यूमर जो काफी organically कहानी का हिस्सा बनता है, और ६० के दशक की simplicity ओढ़े हुए लगता है।

कहानी में कई  खिलंदड़पन से भरपूर वाक्ये होते हैं जैसे  सुनील और ब्लास्ट के चपरासी के बीच में नोकझोक , जहां चपरासी अपनी हाज़िरजवाबी से सुनील को लाजवाब कर देता है। पर गौर करने वाली बात है कि इन सभी जवाबों, सवालों और प्रसंगों में एक सरलता और मासूमियत है, जो कि अब नहीं दिखती, न दिख सकती है। ये कुछ-कुछ इब्न-ए-सफ़ी के विनोद-हमीद की चुहलबाज़ियों की भी याद दिलाते हैं, लेकिन कई मानों में जुदा भी हैं।

साथ ही कहीं कहीं तो इतने understated और matter-of-fact तरीके से व्यंग्य किया गया है, कि वो और भी ज़्यादा असरदार हो जाता है। अब यही उदाहरण देखिये ---
"ब्लास्ट के दफ्तर में धराधड़ काम हो रहा था। सारा स्टाफ बाहरी दुनिया से बेखबर मशीनों की तरह काम कर रहा था। एडिटर रिपोर्टरों से शिकायत कर रहा था कि वे अखबार के लिए सनसनीखेज खबरें नहीं लाते और रिपोर्टर झल्ला के सोच रहे थे कि क्या एडिटर को मशीन में झोंक देने की खबर सनसनीखेज हो सकती है ?"
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हास्य के साथ ही इसमे निहित irony ज़रा देखिये कि जिन साहबों को दुनिया की खबरें सबतक पहुंचानी हैं, वो ही दुनिया से बेखबर हैं !
ऐसे ही कितने ही प्रसंग, बिना वार्निंग के इस कहानी में प्रकट हुए, जिनके वजह से पढ़ने में और आनंद आया।

मुझे ऐसा लगता है कि उत्तरोत्तर, जैसे जैसे सुनील का कैरक्टर बढ़ता गया, सारी कॉमेडी रमाकांत के हिस्से ही आ गयी, और ये subtle ह्यूमर वाला हिस्सा थोड़ा खो सा गया और साथ ही सुनील के खिलंदड़पन की जगह स्मार्ट-टौक ने ले ली। खैर समय भी तो ६० के दशक वाला नहीं रहा!

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